दोनों हाथो में लड्डू

Hindi sex story, kamukta मेरे पिताजी के सबसे करीब मैं ही था क्योंकि घर में मैं सबसे छोटा हूं इसलिए उन्होंने मुझे कभी भी किसी चीज की कमी नहीं होने दी और मेरे माता-पिता दोनों ही मुझे बहुत प्यार किया करते हैं। मैं एक अच्छे स्कूल में भी पढा था जिसकी वजह से मेरी शिक्षा बड़ी ही अच्छी हुई और मैं एक अच्छी कंपनी में काम कर पाया लेकिन अब मैंने नौकरी छोड़ दी है और मैंने अपना ही काम शुरू कर दिया है। सब कुछ बहुत ही अच्छे से चल रहा था लेकिन जब मेरे भैया की शादी हुई तो उसके कुछ समय बाद ही मेरी भाभी ने मेरे भैया के कान भरना शुरू कर दिया और मेरे भैया का नेचर भी कुछ अजीब होने लगा, मेरे भैया का नाम मोहन है और वह बहुत ही कम बात किया करते हैं लेकिन जब से मेरी भाभी सारिका ने उनके कान भरने शुरू करें तो वह पूरी तरीके से बदल गए ना तो वह मम्मी पापा से बात किया करते और ना ही मुझसे बात किया करते हैं उन्हें जब कोई काम होता तो ही वह हम लोगों से बात किया करते थे।

मुझे इस बात का पता काफी समय बाद चला जब मुझे मेरी बहन ने यह सब बताया मेरी बहन की शादी को हुए तीन वर्ष हो चुके हैं और उसे ना जाने यह बात कहां से पता चली लेकिन जब उसने मुझे यह सब बताया कि यह सब सारिका भाभी की वजह से ही हो रहा है मोहन भैया किसी से भी बात नहीं करते उन्हें लगने लगा है कि शायद पिताजी तुम्हें ही ज्यादा प्यार करते हैं और कहीं ऐसा ना हो कि जब जायदाद का बंटवारा हो तो तुम्हारे हिस्से में ज्यादा संपत्ति आ जाए इसी वजह से शायद वह घर में किसी से भी बात नहीं करते। मैंने अपनी बहन से कहा यह तो बड़ी ही दिक्कत की स्थिति पैदा हो गई है अब लगता है मुझे ही कुछ करना पड़ेगा लेकिन मैं कुछ भी नहीं कर सकता था क्योंकि सारिका भाभी भी हमारे घर का हिस्सा थी और मोहन भैया कि मैं बहूत ही इज्जत करता हूं।

एक दिन मुझे मोहन भैया के साथ समय बिताने का मौका मिल गया उस दिन वह घर पर ही थे और मैं भी उस दिन घर पर ही रुका हुआ था और जब हम दोनों की बात हुई तो मैंने भैया से कहा आजकल आप पापा मम्मी से ज्यादा बात नहीं करते वह कहने लगे काम की कोई परेशानी चल रही है मैंने उन्हें कहा लेकिन मुझे नहीं लगता कि काम में कोई परेशानी है। वह मुझसे भी ज्यादा बात नहीं कर रहे थे परंतु मैंने उन्हें समझाया और कहा भैया मैं आपकी बड़ी ही इज्जत करता हूं और मैं सारिका भाभी की भी बहुत ही इज्जत करता हूं लेकिन ना जाने आजकल आप बड़े ही अजीब तरीके से सब लोगों से पेश आ रहे हैं आप ना तो घर में किसी से बात करते हैं और ना ही आपका व्यवहार अब पहले जैसे है आप अब पूरी तरीके से बदल चुके हैं, मोहन भैया कहने लगे नहीं विपिन ऐसा नहीं है यह सब तुम्हें लग रहा होगा क्योंकि यदि ऐसा होता तो शायद मैं तुमसे भी कभी बात नहीं करता लेकिन अभी भी तो मैं तुमसे बात कर ही रहा हूं जब समय होगा तो मैं तुमसे बात क्यों नहीं करूंगा। भैया ने यह कहते हुए बात को टाल दिया उस वक्त मैं उन्हें समझा ना सका लेकिन उनके दिमाग में जो बात भाभी ने भर दी थी वह अब बड़ी होने लगी थी और घर में अब झगड़े भी होने लग गए थे। एक दिन मोहन भैया ने पिताजी के साथ झगड़ा किया उस दिन मुझे बहुत बुरा लगा मैंने उन दोनों के बीच में कुछ नहीं कहा लेकिन पिताजी इस बात से बहुत ही दुखी थे क्योंकि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि मोहन भैया कभी झगड़ा भी करेंगे उन्होंने पिताजी से बड़ी ऊंची आवाज में बात की जिससे कि पिताजी बहुत दुखी थे और उस दिन उन्होंने खाना भी नहीं खाया। मैंने उस दिन पिता जी से कहा आप दुखी ना होइए ऐसा कभी कभार घर में हो जाता है, मैंने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन वह कहने लगे बेटा मैंने तुम मे और मोहन में कभी भी कोई अंतर नहीं किया लेकिन ना जाने आज कल मोहन को यह सब क्यों लग रहा है मैंने कभी भी उसकी परवरिश में कोई कमी नहीं आने दी और उसे भी उतना ही हक दिया है जितना उसे मिलना चाहिए था। पिताजी ने मुझे कहा जब मोहन पढ़ाई कर रहा था तो उस वक्त हमारे घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी इसी वजह से मैं उसे अच्छे स्कूल में ना पढ़ा सका लेकिन उसका यह मतलब तो नहीं है कि मैं उसके बारे में गलत सोचता हूं या मैंने उसमें और तुम में कोई भेदभाव किया है लेकिन भैया के दिमाग में अब यह बात नहीं आ रही थी वह तो पिताजी के साथ ही झगड़ा करने पर उतारू थे।

दरअसल जब भैया स्कूल में पढ़ा करते थे उस वक्त वाकई में हमारे घर की आर्थिक स्थिति खराब हो गई थी और जब मैं पढ़ाई कर रहा था तो सब कुछ ठीक हो चुका था इसलिए पापा ने मुझे अच्छे स्कूल में पढ़ाया लेकिन उसका यह मतलब तो नहीं है कि वह भैया के बारे में कुछ गलत सोच रहे हैं या वह मुझ में और उनमें अंतर कर रहे हैं। इस बात को लेकर पापा बहुत ही ज्यादा दुखी हो चुके थे जिससे कि पापा की तबीयत भी खराब होने लगी थी मुझे यही डर था कि कहीं यह झगड़े अब इतने ना बढ़ जाए की मोहन भैया घर ही छोड़ दें और शायद मेरा सोचना बिल्कुल सही था मोहन भैया सारिका भाभी को अपने साथ लेकर अलग रहने के लिए चले गए घर का माहौल पूरी तरीके से खराब हो चुका था और अब बहुत ही ज्यादा मनमुटाव पिताजी और भैया के बीच में हो गया था मैं इस बात से बहुत ज्यादा दुखी था। मैंने भैया को बहुत समझाया लेकिन भैया नहीं समझे और वह कहने लगे देखो विपिन अब तुम यह सब बात भूल जाओ अब हम लोग अलग ही खुश हैं, समय बीतता चला गया करीब एक वर्ष बाद मेरी भी शादी आकांक्षा के साथ हो गई आकांक्षा का नेचर बहुत ही अच्छा है और वह बहुत समझदार है।

आकांक्षा को जब इस बात का पता चला तो उसने भी सारिका भाभी को समझाने की कोशिश की लेकिन सारिका भाभी ने जो बीज मोहन भैया के दिमाग में बोया था वह बड़ा हो चुका था ना तो मैं अब कुछ कर पा रहा था और ना ही मेरी पत्नी आकांक्षा कुछ कर पा रही थी और पिताजी की तबीयत अब दिन-ब-दिन खराब होने लगी थी हम लोगों से जितना हो सकता था उतनी देखभाल हम लोग करते थे लेकिन एक दिन उनकी तबीयत कुछ ज्यादा ही खराब हो गई इसलिए हमें उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा। मुझे इस बात का बहुत दुख है कि मोहन भैया उस वक्त पिताजी को देखने के लिए भी नहीं आए हम लोगों ने ही सब कुछ किया और जब हम लोग पिताजी को घर ले आए तो मोहन भैया का सिर्फ फोन आया था और वह पूछ रहे थे कि पापा की तबीयत कैसी है मैंने उन्हें उस दिन कहा आप का क्या फर्ज नहीं बनता था, आपको भी तो पापा को देखने आना चाहिए था लेकिन आप तो सिर्फ एक फोन कर के ही पूछ रहे हैं। मैंने भी उस दिन उनसे अच्छे से बात नहीं की क्योंकि अब सब कुछ पहले जैसा नहीं रह गया था आकांक्षा ने मुझे समझाया और कहा आपको अपने भैया के साथ बात करनी चाहिए इन सब बातों को आप को बोलना ही पड़ेगा तभी शायद घर में पहले जैसा माहौल हो पाएगा। इसी के चलते मैंने भी सोचा कि मुझे एक बार मोहन भैया से बात करनी चाहिए और सबसे पहले तो मुझे सारिका भाभी को समझाना चाहिए। मै इसी सिलसिले में एक दिन मोहन भैया से मिलने उनके घर पर चला गया भैया घर पर नहीं थे लेकिन दरवाजा अंदर से बंद था। मैंने दरवाजा खटखटाया तो सारिका भाभी ने दरवाजा खोला और अंदर कोई व्यक्ति बैठा हुआ था जो कि बनियान में था। मैं यह सब देख कर बहुत दुखी हो गया मैं जब अंदर गया तो वह व्यक्ति कहने लगे मैं अब चलता हूं और वह चले गए।

मुझे बहुत बुरा लग रहा था क्योंकि मोहन भैया के जीवन में अब शायद खुशियां नहीं थी और सब कुछ बदल चुका था। मैंने भाभी को समझाया मैने उन्हे कहा आप लोगों को घर आ जाना चाहिए लेकिन वह तो अपनी बात पर अड़ी हुई थी वह कहने लगी अब हमारे लिए उस घर में कोई जगह नहीं है और ना ही हम लोग वहां आना चाहते हैं। मैंने उन्हें कहा आपने इसीलिए भैया को अलग रहने के लिए कहा था कि आप रंगरलिया मना सकें। वह मुझे कहने लगी तुम मुंह संभाल कर बात करो तुम्हारे पापा ने भी तो तुम्हारी भैया को अपना नहीं माना। मैंने उन्हें कहा पापा ने कभी भी हम दोनों में कोई भेदभाव नहीं किया लेकिन आपकी वजह से ही यह सब हुआ है वह मेरी तरफ बड़े गुस्से में देखने लगी है। मेरा पारा चढ चुका था मैंने उनके हाथ को पकड़ते हुए उन्हें वही लेटा दिया। उनके स्तन मुझसे टकराने लगे मेरा मूड पूरी तरीके से खराब हो चुका था।

मैंने जब उनके होठों को चूसना शुरू किया तो वह मचलने लगी, मैंने उनके ब्लाउज के बटन को तोड़ दिया और उनके स्तनों को मैं अपने मुंह में लेकर चूसने लगा। मैंने काफी देर तक उनके स्तनों का रसपान किया, जब मैंने उनकी साड़ी को ऊपर उठाया तो उनकी चूत में मैंने अपना लंड घुसा दिया जैसे ही मेरा लंड उनकी योनि के अंदर प्रवेश हुआ तो वह चिल्लाने लगी। मैं तेजी से उनको धक्के देने लगा, मुझे सारिका भाभी को चोदने में बड़ा मजा आ रहा था। वह भी पूरी तरीके से मेरे काबू में आ चुकी थी इसलिए मैंने उनके हाथों को छोड़ दिया। वह मुझसे लिपट गई मैंने उनके दोनों पैरों को चौड़ा कर लिया और उसके बाद उन्होंने घोड़ी बनाकर चोदना शुरू किया मैंने उन्हें घोडी बनाकर चोदना शुरू किया तो वह अपनी चूतडो को मुझसे मिलाती जिससे कि हम दोनों की गर्मी और बढ़ जाती। मैंने अपने वीर्य को उनकी बडी चूतडो पर गिरा दिया जिससे कि उनके अंदर मेरे लिए प्यार जाग चुका था। मैंने उन्हें समझाया तो वह समझ गई वह कहने लगी मैं तुम्हारे भैय्या को समझा दूंगी और कुछ समय बाद सब कुछ ठीक हो गया। वह भैय्या को लेकर घर वापस लौट आई मैं बहुत खुश था और घर का माहौल भी ठीक था लेकिन मेरे लिए तो दोनों हाथ में लड्डू थे। एक तरफ मेरी पत्नी आंकाक्षा थी और दूसरी तरफ सारिका भाभी मैं उन दोनों के साथ हमेशा मजा लिया करता।

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